मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,
कविता में पिरे
शब्दों की व्यजंना हो तुम,
मर्म-स्पर्शी नव साहित्य की
सृजना हो तुम,
नव प्रभा की पथ प्रदर्शक
लालिमा हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,
स्वप्न दर्शी सुप्त आखों में
बसी तलाश हो तुम,
सावन की कजरी में घुली
मिठास हो तुम,
चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर
सवार एक सुन्दरी हो तुम,
रस भरे अधरों के अलिंगन की
कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम ...............
अतुकांत रचना,लेकिन भई वाह...
ReplyDeleteMithilesh bhai.. ab to har kala me istaad ho gaye... badhai..
ReplyDeletemanbhavan kavita likhi tumne
Jai Hind... Jai Bundelkhand...
चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर
ReplyDeleteसवार एक सुन्दरी हो तुम,
रस भरे अधरों के अलिंगन की
कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम
वाह!मिथलेश जी आज तो कमाल कर दिया।
पुराने दिनो की याद दिला दी, जब कल्पनाएं जवान थी।बधाई
आज तो दुबे भाई को सजदा किए बिन न जाऊंगा।
ReplyDeleteतुम मेरे दिल की कोरी कल्पना हो .वाह पंडित जी... बहुत बढ़िया .
ReplyDeleteबहुत उत्तम रचना ......
ReplyDeleteAadhunik kaal ki kavita ka ek uttam udaharan hai ye kavita ...bahut sundar bhav aur shabd chayan bhi bahut hi accha hai....Aabhar!!
ReplyDeletehttp://kavyamanjusha.blogspot.com/
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,
ReplyDeleteस्वप्न दर्शी शुप्त आखों में
बसी तलाश हो तुम,
वाह! बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ...बहुत सुंदर कविता.... बहुत अच्छी लगी यह कविता...
भाव इतने स्पष्ट हैं कि वे कल्पना के अनंत गर्भ में लीन हो गये हैं।
ReplyDeleteवाह वाह क्या बात है...मिथिलेश स्साब...आप तो बड़े छुपे रुस्तम निकले..बड़ी प्यारी कविता कह डाली...अरे ये कोरी कल्पना नहीं रहेगी..हकीकत में जल्द ही बदलेगी...बस इंतज़ार करो...
ReplyDeleteबहुत फंतासी कविता है
ReplyDeleteबहुत प्यारी और सुन्दर कल्पना ....
ReplyDeleteवाह वाह बहुत ही प्यारी कल्पना को बहुत प्यारे शब्द सिये हैं....बहुत सुंदर..
ReplyDeleteसूक्ष्म टिप्पणीकारों पर अच्छा व्यंग्य किया है आपने. अरे या तो आप टिप्पणी कीजिये ही मत और कीजिये तो पोस्ट के बारे में कुछ तो लिखिये कि कैसी लिखी है?
ReplyDeletetabhi to ishwar ki adbhut rachna ho tum
ReplyDeleteबहुत बढिया रचना है .. बहुत बधाई !!
ReplyDeleteबहुत खूब!! वाह!
ReplyDelete" zakaash ! bahut hi badhiya post ."
ReplyDelete----- eksacchai { AAWAZ }
http://eksacchai.blogspot.com
ReplyDeleteअजय कुमार झा
प्रिय मिथिलेश ये कविताई अंदाज़ मुझे ज्यादा भाता है तुम्हारा , बहुत खूब लिखा है , बस एक शब्द जो शायद गलती से लिखा गया है "शुप्त " की जगह सुप्त होगा शायद ....या पता नहीं यार , देख लेना एक बार
मिथिलेश ...
ReplyDeleteआजकल अपनी हर रचना से चौंकाने लगे हो ...चन्द्र नगर के चन्द्र रथ पर सवार कोरे दिल की कल्पना ...क्या बात है ...बहुत सुन्दर ...
अजय जी की सलाह पर गौर करना ...
बहुत आशीष व शुभकामनायें ....!!
अच्छे शब्दों का प्रयोग किया है
ReplyDeleteसुन्दर भाव
चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर
ReplyDeleteसवार एक सुन्दरी हो तुम,
रस भरे अधरों के अलिंगन की
कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम ...............
मिथिलेश जी, कभी कभी मीठे ख्वाब देखना बहुत अच्छा लगता है न वो भी भरी जवानी में ! :) और अगर एक कवि कवाब देख रहा हो तो फिर क्या कहने ! बहुत सुन्दर !!
ह्रदय की गहराई को बहुत ही अछे शब्द दिए है आप ने
ReplyDeleteसादर
प्रवीण पथिक
9971969084
Aapki kavita adbhut hai.
ReplyDeleteIs kavita par Mukti ji ki tippani apoorv hai.
Badhai.
ग़ज़ब की कल्पना है मिथिलेश जी आपकी .......... अच्छा लगा जान कर ..........
ReplyDeleteआज तो मैं भी बलायें लिये बिना न जाऊँगी । शुभ सन्केत मिल रहे हैं । कहीं किसी की नज़र न लगे जल्दी से इसे हकीकत मे बदल दो आशीर्वाद्
ReplyDeletehay, please see my blog RAMRAY.BLOGSPOST.COM
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